Christmas: दिसंबर आते ही शहर रोशनी से चमक उठते हैं। सजावट, लाइटें और “मेरी क्रिसमस” की शुभकामनाएँ — उत्सव जैसा माहौल अपने-आप बन जाता है। आज क्रिसमस केवल ईसाई समुदाय का त्योहार नहीं रहा; कई हिंदू और जैन परिवार भी इसे खुशी से मनाते हैं।
Christmas: इस माहौल के बीच एक सहज-सा प्रश्न उठता है:
जब हम दूसरे त्यौहार को अपनाते हैं — क्या हम उतनी ही गहराई से अपने त्योहारों से भी जुड़े रहते हैं?
यह प्रश्न तुलना के लिए नहीं,
बल्कि जागरूकता के लिए है।
Christmas: त्योहार — सिर्फ उत्सव नहीं, हमारी पहचान भी
हर धर्म के त्यौहार उसके दर्शन को व्यक्त करते हैं।
जैन धर्म — अहिंसा, संयम और आत्मचिंतन की राह दिखाता है।
हिंदू त्यौहार — प्रकृति, परिवार और आध्यात्मिकता से जुड़ते हैं।
अपनी परंपराएँ मनाकर हम:
- जड़ों से जुड़े रहते हैं
- बच्चों को संस्कृति सिखाते हैं
- मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं
लेकिन जब “ट्रेंड” के कारण दूसरे त्योहार अधिक आकर्षक लगने लगते हैं, तो कभी-कभी हमारी अगली पीढ़ी यह समझ नहीं पाती कि हमारे अपने त्यौहार की असली गहराई क्या है।
Christmas: डेटा क्या बताता है? — Pew Research का एक महत्वपूर्ण संकेत

Pew Research Center के एक सर्वे के अनुसार (USA के संदर्भ में):
- 96% ईसाई
- 87% बिना धर्म वाले लोग
- 76% बौद्ध
- 73% हिंदू
- और 31% यहूदी
क्रिसमस मनाते हैं।
यह आँकड़ा दिखाता है कि क्रिसमस केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है — जिसमें कई समुदाय स्वेच्छा से शामिल होते हैं।
यहीं से चर्चा का एक दूसरा पक्ष शुरू होता है:
क्या विविधता में शामिल होना अच्छा है —
या क्या इससे हमारी अपनी परंपराएँ पीछे छूट सकती हैं?
यह कोई आसान सवाल नहीं —
लेकिन इस पर विचार होना ज़रूरी है।
Christmas का संदेश — और हमारी परंपराओं का संतुलन
क्रिसमस प्रेम, दान और साथ-मिलकर खुशियाँ बाँटने का प्रतीक है —
और यह सुंदर संदेश है।
हालाँकि आधुनिक जीवन में यह कई जगह:
- मॉल-कल्चर
- गिफ़्ट-कल्चर
- पार्टियों और शॉपिंग
से जुड़ जाता है।
दूसरी ओर, हमारे कई त्योहार भीतर झाँकने की प्रेरणा देते हैं:
- पर्युषण — क्षमा और आत्मसंयम
- दीपावली — भीतर के अंधकार पर प्रकाश
- होली — अहंकार का दहन
- उपवास — अनुशासन और जागरूकता
यह तुलना “कौन बेहतर” तय करने के लिए नहीं,
बल्कि यह समझने के लिए है कि हर संस्कृति के त्योहारों का उद्देश्य अलग-अलग हो सकता है।
“सब celebrate करते हैं” — क्या यह पर्याप्त कारण है?
उत्सव मनाना गलत नहीं।
लेकिन कभी-कभी खुद से ये सवाल पूछना उपयोगी है:
- यह उत्सव मुझे क्या सिखा रहा है?
- क्या यह मेरी पहचान मजबूत करता है?
- क्या मैं अपने त्योहारों का अर्थ समझकर जी रहा हूँ?
यही प्रश्न हमें सजग बनाते हैं।
Christmas: सम्मान करें — पर अंधानुकरण नहीं
दूसरे धर्मों के त्यौहार का सम्मान करना आवश्यक है।
उत्सव साझा करना संबंधों में गर्माहट लाता है।
लेकिन साथ-साथ:
- अपनी परंपराओं को “optional” न बनाएं
- बच्चों को उनके अर्थ समझाएँ
- संस्कृति को जीवन का हिस्सा बनाए रखें
दुनिया के कई समाज अपनी पहचान सहेजकर आगे बढ़ते हैं —
हम भी ऐसा कर सकते हैं, बिना किसी के प्रति नकारात्मक हुए।
बच्चों पर असर — वे क्या सीख रहे हैं?
बच्चे वही सीखते हैं जो वे रोज़ देखते हैं।
अगर घर में:
- क्रिसमस ट्री सजता है
- सैंटा की कहानियाँ सुनाई जाती हैं
लेकिन
पर्युषण, तप या दीपावली केवल औपचारिक रह जाएँ,
तो बच्चे यह मान सकते हैं कि विदेशी त्यौहार ज़्यादा “खास” हैं।
इसलिए संतुलन ज़रूरी है —
समझ, तुलना नहीं।
“Christmas न मनाना” मुद्दा नहीं — सजग रहना मुद्दा है
यह चर्चा:
- मनाही
- विरोध
- दूरी
के बारे में नहीं है।
यह है:
- अपने धर्म के प्रति जागरूक रहने के बारे में
- दिखावे से परे अर्थपूर्ण उत्सव चुनने के बारे में
- अपनी पहचान को समझकर जीने के बारे में
इस दिसंबर — एक संतुलित रास्ता
- बच्चों को जैन-हिंदू त्योहारों की कहानियाँ सुनाएँ
- क्षमा, दया और अनुशासन पर बातचीत करें
- घर में सरल, शांत और आध्यात्मिक माहौल बनाएं
- उपहारों के साथ मूल्य भी साझा करें
और अगर क्रिसमस का उत्साह दिखे —
उसे सम्मान दें, समझें —
पर अपनी परंपराओं को पीछे न रखें।
अंत में — निर्णय नहीं, सोच की शुरुआत
तो क्या हमें क्रिसमस मनाना चाहिए?
शायद सही उत्तर यह है:
- अगर यह हमें प्रेम और करुणा सिखाए — तो सीखें।
- अगर यह केवल दिखावा बन जाए — तो ठहरकर सोचें।
- और साथ-साथ, अपने त्योहारों को समझकर, उन्हें भी उतनी ही गरिमा दें।
उत्सव वहीं है — जहाँ मन विनम्र हो और आत्मा समृद्ध।
आइए —
दूसरों के त्योहारों का सम्मान करें,
और अपनी परंपराओं को भी गर्व और समझ के साथ जिएँ।
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