मंदिर जाने के नियम: इन 8 बातों का रखें ध्यान
मंदिर जाने के नियम: मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही हम हाथ जोड़ लेते हैं। सिर झुका लेते हैं। प्रभु के सामने कुछ पल खड़े होते हैं।
लेकिन क्या हमारा मन भी उसी समय शांत होता है?
कई बार शरीर मंदिर में होता है, लेकिन मन कहीं और होता है। किसी की बात याद आ रही होती है। किसी से हुई नाराजगी मन में चल रही होती है। या फिर आसपास के लोगों को देखकर हमारा ध्यान भटक जाता है।
मंदिर जाना सिर्फ पूजा करने की बात नहीं है। यह कुछ देर अपने भीतर देखने का मौका भी है। इसलिए अगली बार मंदिर जाएं, तो सिर्फ हाथ नहीं, मन भी जोड़ें।
1. प्रभु के सामने जाएं तो कुछ देर दुनिया को पीछे छोड़ दें
मंदिर में पहुंचकर भी हमारा ध्यान आसपास की चीजों पर चला जाता है। कौन आया है, कौन क्या कर रहा है और कौन कितनी देर से पूजा कर रहा है।
लेकिन प्रभु के सामने बिताए कुछ पल सिर्फ अपने लिए रखें।
- आसपास की बातों पर ध्यान न दें।
- कुछ देर शांत रहने की कोशिश करें।
- अपनी चिंताओं को थोड़ी देर किनारे रखें।
- अपना ध्यान प्रभु और अपने भाव पर रखें।
मंदिर में शरीर लेकर जाना आसान है, मन लेकर जाना जरूरी है।
2. दूसरों को देखकर अपनी जिंदगी को न तौलें
किसी को देखकर लगता है कि उसके पास हमसे ज्यादा सुख है। किसी की सफलता देखकर अपनी कमी याद आ जाती है।
लेकिन हर किसी की जिंदगी अलग है। मंदिर में जाकर भी अगर हम अपनी जिंदगी को दूसरों से तौलते रहेंगे, तो मन को शांति कैसे मिलेगी?
- किसी के सुख को देखकर अपना जीवन छोटा न समझें।
- किसी की सफलता को देखकर निराश न हों।
- अपने पास मौजूद चीजों को याद करें।
- अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने पर ध्यान दें।
जो आपके पास है, उसकी कीमत भी समझें।
3. प्रभु के सामने अपनी इच्छाओं की लंबी सूची ही न रखें
प्रार्थना में अपनी इच्छा रखना गलत नहीं है। लेकिन क्या हर बार हमारी प्रार्थना सिर्फ इस बात से शुरू हो कि हमें क्या चाहिए?
इस बार प्रार्थना का तरीका बदलकर देखिए।
- जो मिला है, उसके लिए धन्यवाद दें।
- जो नहीं मिला, उसके लिए धैर्य रखें।
- जो करना है, उसके लिए सही बुद्धि मांगें।
- जो बदलना है, उसे बदलने की शक्ति मांगें।
प्रार्थना सिर्फ पाने के लिए नहीं, खुद को बेहतर बनाने के लिए भी हो सकती है।
4. प्रभु के अभिषेक को सिर्फ एक रस्म न बनाएं
अभिषेक करते समय हमारा ध्यान केवल क्रिया पूरी करने पर न हो। कुछ पल प्रभु के सामने अपने मन को भी शांत करें।
अभिषेक को आत्मचिंतन से जोड़ें।
- अभिषेक जल्दबाजी में न करें।
- अपने मन को शांत रखें।
- अपने भीतर के भावों पर विचार करें।
- एक अच्छी आदत अपनाने का संकल्प लें।
प्रभु का अभिषेक करें और साथ में अपने मन को भी निर्मल करने की कोशिश करें।
5. किसी दूसरे के पूजा करने के तरीके पर ध्यान न दें
कोई लंबे समय तक पूजा करता है। कोई जल्दी दर्शन करके चला जाता है। किसी की पूजा की विधि अलग होती है।
हर व्यक्ति का भाव अलग हो सकता है।
- दूसरे की पूजा से अपनी पूजा की तुलना न करें।
- किसी की भक्ति को कम या ज्यादा न आंकें।
- किसी के तरीके पर टिप्पणी न करें।
- अपने भाव पर ध्यान दें।
दूसरों को परखने से बेहतर है खुद को देखना।
6. मंदिर में अपने मन को दिखावे से बचाएं
भक्ति दूसरों को दिखाने की चीज नहीं है। प्रभु के सामने सबसे जरूरी आपका भाव है।
एक बार खुद से पूछें—अगर मुझे कोई देख न रहा हो, तो क्या मैं फिर भी उसी भाव से पूजा करूंगा?
- पूजा को दिखावे का माध्यम न बनाएं।
- दूसरों से अपनी भक्ति की तुलना न करें।
- अपनी पूजा को बड़ा साबित करने की कोशिश न करें।
- जो करें, पूरे मन से करें।
भक्ति को दिखावे की नहीं, सच्चे भाव की जरूरत होती है।
7. दर्शन के बाद अपने व्यवहार में भी बदलाव लाएं
मंदिर में सिर झुकाना आसान है। लेकिन मंदिर से बाहर निकलकर अपने व्यवहार को बदलना ज्यादा जरूरी है।
अगर दर्शन के बाद भी हमारा व्यवहार वैसा ही रहे, तो हमें खुद से सवाल करना चाहिए।
- बात करते समय शब्दों का ध्यान रखें।
- छोटी बातों पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
- किसी को दुख दिया है तो माफी मांगें।
- दिनभर अच्छी सोच बनाए रखने की कोशिश करें।
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दर्शन का असर हमारे व्यवहार में दिखना चाहिए।
8. प्रभु के सामने जो संकल्प लें, उसे जीवन में भी निभाएं
मंदिर में खड़े होकर हम कई बार मन में अच्छे विचार लाते हैं। लेकिन कुछ देर बाद रोज की भागदौड़ में वही बातें पीछे छूट जाती हैं।
इसलिए मंदिर में लिया गया छोटा-सा संकल्प अपने व्यवहार का हिस्सा बनाने की कोशिश करें।
- आज किसी से कठोर शब्द नहीं बोलूंगा।
- किसी की बात पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दूंगा।
- जो मिला है, उसके लिए आभारी रहूंगा।
- अपनी एक गलत आदत सुधारने की कोशिश करूंगा।
सच्चा संकल्प वही है जो मंदिर से बाहर भी हमारे साथ रहे।
मंदिर जाने के नियम: मंदिर में हाथ जोड़ना आसान है, मन जोड़ना क्यों मुश्किल?
हाथ जोड़ना कुछ सेकंड का काम है। लेकिन मन को शांत करना, अपनी कमियों को देखना और अपने भावों को संभालना आसान नहीं है।
शायद इसलिए मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं है। यह अपने भीतर लौटने का अवसर भी है।
अगली बार मंदिर जाएं तो सिर्फ यह न सोचें कि प्रभु से क्या मांगना है। यह भी सोचें कि प्रभु के सामने खड़े होकर अपने भीतर क्या बदलना है।
जो मिला है, उसके लिए धन्यवाद दें। जो नहीं मिला, उसके लिए धैर्य रखें। दूसरों को देखने के बजाय खुद को देखें।
क्योंकि मंदिर से लौटते समय अगर हमारी सोच थोड़ी शांत हो जाए, व्यवहार थोड़ा अच्छा हो जाए और मन थोड़ा हल्का हो जाए, तो शायद हमने सिर्फ प्रभु के दर्शन नहीं किए, बल्कि खुद को भी थोड़ा समझा है।
मंदिर में हाथ जोड़ना भक्ति है, लेकिन मन जोड़ना उसका असली भाव है।
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