केशवरायपाटन: दूध की धारा देखते ही भाग पड़े आक्रमणकारी

केशवरायपाटन: दूध बहता देख कांप उठे आक्रमणकारी

केशवरायपाटन: राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित केशवरायपाटन एक ऐसा पावन तीर्थ है, जहां पहुंचते ही मन शांत हो जाता है। क्या आप कभी ऐसे स्थान पर गए हैं, जहां इतिहास भी जीवित हो और आस्था भी सांस लेती हो? यह वही भूमि है।

यहां का वातावरण श्रद्धा से भरा है। सदियों से यह स्थान जैन समाज की आस्था का बड़ा केंद्र रहा है। जो भी यहां आता है, वह केवल दर्शन करके नहीं लौटता, बल्कि भीतर से नई ऊर्जा लेकर लौटता है। https://jinspirex.com/tirth-yatra-se-pehle-10-zaruri-baatein/

यहां स्थित है श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, जो अपनी प्राचीनता और भगवान की अतिशयकारी प्रतिमा के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

केशवरायपाटन: 2500 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी प्रतिमा

इस तीर्थ की सबसे बड़ी महिमा है मूलनायक 1008 श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान की लगभग 2500 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी प्रतिमा।

यह प्रतिमा मोंगिया रंग के पाषाण से निर्मित है। करीब साढ़े चार फुट ऊंची है। भगवान पद्मासन मुद्रा में विराजमान हैं। प्रतिमा के मुख पर ऐसी दिव्य शांति दिखाई देती है, जिसे देखकर मन अपने आप स्थिर हो जाता है।

भगवान के सिर के पीछे भामंडल बना है। ऊपर छत्रत्रयी है। दोनों ओर देव मालाएं लिए हुए हैं। अधोभाग में वरुण, यज्ञ, बहुरूपिणी और यक्षिणी की सुंदर आकृतियां बनी हैं।

दर्शन करते ही लगता है जैसे समय ठहर गया हो।

Rajasthan: संवत 336 की प्रतिष्ठा, जब हुई पुष्प वर्षा

मान्यता है कि इस अतिशयकारी प्रतिमा की प्रतिष्ठा कार्तिक सुदी 13, संवत 336 में हुई थी।

तब प्रतिमा को भूगर्भ गृह में विराजमान किया गया। कहा जाता है कि प्रतिष्ठा के समय देवों ने आकाश से जय-जयकार की। पुष्प वर्षा हुई। केसर वर्षा हुई।

कल्पना कीजिए, वह दृश्य कितना अद्भुत रहा होगा।

तभी से यह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

केशवरायपाटन: प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णित है महिमा

इस तीर्थ की महिमा इतनी प्राचीन है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव ने भी इसका उल्लेख किया।

उन्होंने कहा —
“आसार में पट्टणि मुनिसुव्वओं तहेव वन्दामि।”

अर्थात केशवरायपाटन स्थित भगवान मुनिसुव्रतनाथ को मैं नमस्कार करता हूं।

इससे स्पष्ट होता है कि पहली शताब्दी में भी यह तीर्थ दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

केशवरायपाटन: नदी से निकली शिला, फिर बना यह महान तीर्थ

तेरहवीं शताब्दी के विद्वान यतिवर मदनकीर्ति ने इस प्रतिमा का इतिहास बताया है।

कथा के अनुसार एक बार नदी से एक विशाल शिला निकली। उसे नगर में लाया गया। फिर उस पर किस देव की स्थापना हो, इसे लेकर विवाद हुआ।

अंत में उसी शिला पर भगवान मुनिसुव्रतनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा स्थापित हुई। प्रतिष्ठा के समय जयकार हुई और फूल बरसे।

तभी से यह स्थान श्रद्धा का केंद्र बन गया। https://jinspirex.com/chaturmukha-basadi-its-architecture-says-everyone-is-equal-before-god/

केशवरायपाटन: हटाने की कोशिश हुई, पर प्रतिमा नहीं हिली

कहा जाता है कि बाद में कुछ लोगों ने प्रतिमा को वहां से हटाने का प्रयास किया।

अनेक उपाय किए गए। बहुत प्रयास हुए। लेकिन प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली।

भक्त इसे भगवान का अतिशय मानते हैं।

केशवरायपाटन: जब प्रतिमा से तेज दूध की धारा निकली 

इस तीर्थ से जुड़ी एक प्रसिद्ध जनश्रुति आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देती है। कहा जाता है कि आक्रमण के समय भगवान की अतिशयकारी प्रतिमा को तोड़ने का प्रयास किया गया।

पहले हथौड़े चलाए गए। फिर छैनी से वार किए गए। लेकिन प्रतिमा टस से मस नहीं हुई।

जब काटने का प्रयास किया गया, तभी प्रतिमा से अचानक दूध की धारा फूट पड़ी। कहा जाता है कि धारा इतनी तेज थी कि वहां खड़े लोग संभल नहीं सके। https://jinspirex.com/mira-road-incident-7-reasons-this-case-is-deeply-concerning/

पूरा स्थान दूध से भरने लगा। यह दृश्य देखकर आक्रमणकारी भयभीत हो गए और वहां से भाग खड़े हुए।

आज भी प्रतिमा पर कुछ निशान दिखाई देते हैं, जिन्हें लोग उसी घटना का साक्षी मानते हैं।

Rajasthan: जब 100 साल बाद भी जोत जलती मिली

करीब 100 वर्ष पहले नगर में भयंकर प्लेग फैला। लोग नगर छोड़कर चले गए।

कुछ श्रद्धालु पहले मंदिर पहुंचे। उन्होंने भगवान के सामने जोत जलाई और प्रार्थना कर चले गए।

कई महीने बाद जब लोग लौटे, तो मंदिर पहुंचे। वहां देखा कि जोत अब भी जल रही थी।

यह दृश्य देखकर सबकी आंखें भर आईं।

केशवरायपाटन: भोंहरे में और भी प्राचीन धरोहरें

इस पवित्र भोंहरे में केवल मूलनायक प्रतिमा ही नहीं, बल्कि और भी प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं।

यहां 13वीं शताब्दी की छह प्रतिमाएं हैं। अरिहंतों की प्राचीन प्रतिमाएं हैं। एक सुंदर देवी प्रतिमा भी स्थापित है।

पद्मप्रभु भगवान की खड्गासन प्रतिमा भी यहां विशेष आकर्षण का केंद्र है।

Jain: प्रमुख तीर्थों से दूरी

  • दादाबाड़ी (कोटा) – 30 किमी
  • बिजौलिया (पार्श्वनाथ) – 85 किमी
  • चम्बलेश्वर – 85 किमी
  • जहाजपुर – 105 किमी
  • चांदखेड़ी – 105 किमी
  • सवाई माधोपुर (चमत्कार जी) – 110 किमी
  • केथूली – 125 किमी
  • पदमपुरा – 200 किमी
  • श्री महावीर जी – 225 किमी

पता – संपर्क सूत्र

श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र
केशवरायपाटन, जिला बूंदी, राजस्थान – 323601

फोन: 07438-264323
मोबाइल: 9351996323

केशवरायपाटन: जीवन में एक बार जरूर जाएं

कुछ स्थान केवल देखे नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।

केशवरायपाटन ऐसा ही तीर्थ है। अगर मन अशांत हो, तो एक बार यहां जरूर आइए।

हो सकता है भगवान की अतिशयकारी प्रतिमा के दर्शन आपके भीतर नई शांति जगा दें।

https://www.jaindata.com/jain_temple/shri-munisuvrathnath-digambar-jain-atishay-shetra-keshavrai-patan___c84112e9-e2d1-4d4a-89f4-736d452f2066/Details.aspx

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