गणतंत्र दिवस: उत्सव से आगे एक पहचान
गणतंत्र दिवस भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय पर्व है।
यह सिर्फ परेड, झंडे और आसमान में उड़ते फाइटर जेट्स का दिन नहीं होता।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम एक देश के रूप में क्या सोचते हैं।
हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं।
और हमारे मूल्य किस दिशा में जा रहे हैं।
हर साल 26 जनवरी को हम गर्व महसूस करते हैं।
हम राष्ट्र की शक्ति और अनुशासन को देखते हैं।
लेकिन शायद कम ही बार यह सोचते हैं कि इन तैयारियों के पीछे क्या फैसले लिए गए हैं।
क्योंकि राष्ट्रीय पर्व सिर्फ दिखने वाली तस्वीरों से नहीं बनता।
वह उन निर्णयों से बनता है, जो पर्दे के पीछे लिए जाते हैं।
और कभी-कभी वही फैसले हमें असहज कर देते हैं।

जब एक खबर हमें रुककर सोचने पर मजबूर करे
हम रोज़ सोशल मीडिया पर जानवरों से जुड़ी पोस्ट देखते हैं।
कभी किसी घायल पक्षी की तस्वीर।
कभी किसी जानवर के साथ क्रूरता का वीडियो।
हम देखते हैं।
हमें बुरा लगता है।
और फिर हम आगे बढ़ जाते हैं।
अक्सर हम यहीं रुक जाते हैं।
हम यह नहीं पूछते कि ऐसा क्यों हुआ।
और यह भी नहीं सोचते कि हम क्या कर सकते हैं।
लेकिन हाल ही में सामने आई एक खबर ने लोगों को सिर्फ दुखी नहीं किया।
उसने उन्हें चुप कर दिया।
खबर यह थी कि दिल्ली में गणतंत्र दिवस की सुरक्षा के लिए 1,270 किलो बिना हड्डी का चिकन इस्तेमाल किया गया।
यह सिर्फ एक सूचना नहीं थी।
यह एक सवाल था।
एक ऐसा सवाल, जो सुरक्षा और संवेदना के बीच खड़ा था।
जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि—
क्या करुणा अब सिर्फ पोस्ट और captions तक सीमित रह गई है?
और क्या सुरक्षा के नाम पर सवाल पूछना गलत होता जा रहा है?
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यहीं से यह चर्चा शुरू होती है।
आरोप लगाने के लिए नहीं।
बल्कि आत्ममंथन के लिए।
पूरा मामला क्या है?
हर साल 26 जनवरी को दिल्ली में भव्य परेड होती है। इस दौरान फाइटर जेट्स और हेलीकॉप्टर कम ऊँचाई पर उड़ते हैं।
दिल्ली और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में पक्षी उड़ान भरते हैं। अगर कोई पक्षी विमान से टकरा जाए, तो बड़ा हादसा हो सकता है। इसे Bird Strike कहा जाता है।
इसी खतरे को कम करने के लिए सुरक्षा एजेंसियाँ कुछ इलाकों में चिकन रखती हैं। इसका मकसद पक्षियों को वहीं रोकना होता है। ताकि वे एयर शो के रास्ते में न आएँ।
तकनीकी रूप से यह एक सुरक्षा रणनीति है। लेकिन नैतिक रूप से यह सवाल खड़े करती है।
1,270 किलो चिकन: सिर्फ एक संख्या नहीं
1,270 किलो चिकन बहुत बड़ी मात्रा है। यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है।
इसके पीछे कई सवाल छिपे हैं:
- यह मांस कहाँ से आया?
- इसके लिए कितने जीवों का जीवन गया?
- क्या यह सच में ज़रूरी था?
जब यह खबर सामने आई, तो कई लोगों को पीड़ा हुई। खासतौर पर उन लोगों को, जो करुणा और अहिंसा में विश्वास रखते हैं।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है: क्या हमारी व्यवस्था इतनी असंवेदनशील हो गई है?
सुरक्षा बनाम संवेदना
यह मुद्दा आसान नहीं है। इसे सही या गलत में बाँटना भी आसान नहीं।
एक तरफ है सुरक्षा:
- पायलटों की जान
- दर्शकों की सुरक्षा
- किसी बड़े हादसे से बचाव
दूसरी तरफ है संवेदना:
- मासूम जीवों का जीवन
- करुणा की भारतीय सोच
- सहअस्तित्व का विचार
यहीं पर टकराव होता है।
क्या सुरक्षा के नाम पर संवेदना को पीछे छोड़ देना सही है?
क्या कोई और रास्ता नहीं था?
दुनिया के कई देशों में पक्षियों से टकराव रोकने के लिए दूसरे उपाय अपनाए जाते हैं।
जैसे:
- अल्ट्रासोनिक साउंड सिस्टम
- बर्ड ट्रैकिंग रडार
- प्राकृतिक आवास प्रबंधन
- उड़ान समय में बदलाव
सवाल यह नहीं है कि तकनीक है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमने संवेदनशील विकल्पों को प्राथमिकता दी।
यह खबर हमें क्या सिखाती है?
यह खबर सिर्फ सुरक्षा की नहीं है। यह हमारी सोच का आईना है।
आज हम पर्यावरण और करुणा की बात करते हैं। लेकिन ऐसे फैसले हमें खुद से सवाल पूछने पर मजबूर करते हैं।
- क्या राष्ट्रीय गर्व सिर्फ शक्ति दिखाने का नाम है?
- क्या हमारे मूल्यों की इसमें जगह है?
गणतंत्र दिवस हमें संविधान की याद दिलाता है। संविधान सिर्फ अधिकार नहीं सिखाता। वह कर्तव्यों की भी बात करता है।
आरोप नहीं, आत्ममंथन ज़रूरी है
यह लेख किसी को दोषी नहीं ठहराता। यह सिर्फ सोचने का आग्रह करता है।
एक सभ्य समाज वही होता है: जो सुरक्षित भी हो। और संवेदनशील भी।
अगली बार जब हम आसमान में जेट्स देखें, तो एक सवाल मन में आए:
क्या हमारी प्रगति करुणा के साथ चल सकती है?
अगर यह सवाल हमें असहज करता है, तो यही इसकी सफलता है।
क्योंकि राष्ट्र सिर्फ ताकत से नहीं बनता। वह मूल्यों से बनता है। और वही उसकी असली पहचान होती है।
https://www.news18.com/india/birds-eye-view-of-republic-day-security-how-1270-kg-chicken-will-keep-delhis-skies-clear-9831704.html